RSS

पत्रकारों से एक अपील : खबरों की समझ के सिलसिले में

16 Feb

साथी पत्रकार बंधुओ,

देश में नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद के नाम पर चल रहे सरकारी दमन के बीच मीडिया और आप सभी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सत्ता जब मीडिया को अपना हथियार व पुलिस पत्रकारों को अपनी बंदूक की गोली की भूमिका में इस्तेमाल करे तो ऐसे समय में हमे ज्यादा सर्तक रहने की जरूरत है। पुलिस की ही तरह हमारी कलम से निकलने वाली गोली से भी एक निर्दोष के मारे जाने की उतनी ही संभावना होती है, जितनी कि एक अपराधी की। हमें यहां यह बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं क्योंकि नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद जैसे मुददों पर रिपोर्टिंग करते समय हमारे ज्यादातर पत्रकार साथी न केवल पुलिस के प्रवक्ता नजर आते हैं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा वह उन पत्रकारीय मूल्यों को भी ताक पर रख देते हैं, जिसके बल पर उनकी विश्वसनियता बनी है।

हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हाल ही में इलाहाबाद में पत्रकार सीमा आजाद व कुछ अन्य लोगों की गिरफ्तारी के बाद भी मीडिया व पत्रकारों का यही रुख देखने को मिला। सीमा आजाद इलाहाबाद में करीब 12 सालों से एक पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के बतौर सक्रिय रही हैं। इलाहाबाद में कोई भी सामाजिक व्यक्ति या पत्रकार उन्हें आसानी से पहचानता होगा। कुछ नहीं तो वैचारिक-साहित्यिक सेमिनार/गोष्ठियां कवर करने वाले पत्रकार उन्हें बखूबी जानते होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब पुलिस ने उन्हीं सीमा आजाद को माओवादी बताया तो किसी पत्रकार ने आगे बढ़ कर इस पर सवाल नहीं उठाया। आखिर क्‍यों? क्यों अपने ही बीच के एक व्यक्ति या महिला को पुलिस के नक्सली, माओवादी बताये जाने पर हम मौन रहे? पत्रकार के तौर पर हम एक स्वाभाविक सा सवाल क्यों नहीं पूछ सके कि किस आधार पर एक पत्रकार को नक्सली, माओवादी बताया जा रहा है? क्या कुछ किताबें या किसी के बयान के आधार पर किसी को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा सकता है? और अगर पुलिस ऐसा करती है तो एक सजग पत्रकार के बतौर क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?

पत्रकार साथियों को ध्यान हो, तो यह अक्सर देखा जाता है कि किसी गैर नक्सली, माओवादी की गिरफ्तारी दिखाते समय पुलिस एक रटा-रटाया सा आरोप उन पर लगाती है। मसलन यह फलां क्षेत्र में फलां संगठन की जमीन तैयार कर रहा था/रही थी, या कि वह इस संगठन का वैचारिक लीडर था/थी, या कि उसके पास से बड़ी मात्रा में नक्सली/माओवादी साहित्य (मानो वह कोई गोला बारूद हो) बरामद हुआ है। आखिर पुलिस को इस भाषा में बात करने की जरूरत क्यों महसूस होती है? क्या पुलिस के ऐसे आरोप किसी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं? किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना या किसी खास राजनीतिक विचारधारा (भले ही वो नक्सली/माओवादी ही क्यों न हो) से प्रेरित साहित्य पढ़ना कोई अपराध है? अगर नहीं तो पुलिस द्वारा ऐसे आरोप लगाते समय हम चुप क्यों रहते हैं? क्यों हम वही लिखते हैं, जो पुलिस या उसके प्रतिनिधि बताते हैं। यहां तक कि पुलिस किसी को नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी बताती है और हम उसके आगे ‘कथित’ लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं करते। क्यों?

हम जानते हैं कि हमारे वो पत्रकार साथी जो किसी खास दुराग्रह या पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते, वह भी खबरें लिखते समय ऐसी ‘भूल’ कर जाते हैं। शायद उन्हें ऐसी ‘भूल’ के परिणाम का अंदाजा न हो। उन्हें नहीं मालूम कि ऐसी ‘भूल’ किसी की जिंदगी और सत्ता-पुलिसतंत्र की क्रूरता की गति को तय करते हैं।

जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) सभी पत्रकार बंधुओं से अपील करती हैं कि नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद की रिपोर्टिंग करते समय कुछ मूलभूत बातों का ध्यान अवश्य रखें।

1. साथियो, नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद तीनों अलग-अलग विचार हैं। नक्सलवाद, माओवाद राजनीतिक विचारधाराएं हैं तो आतंकवाद किसी खास समय, काल व परिस्थितियों से उपजे असंतोष का परिणाम है। यह कई बार हिंसक व विवेकहीन कार्रवाई होती है जो जन समुदाय को भयाक्रांत करती है। इन सभी घटनाओं को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। नक्सलवादी, माओवादी विचारधारा का समर्थक होना कहीं से भी अपराध नहीं है। इस विचारधारा को मानने वाले कुछ संगठन खुले रूप में आंदोलन चलाते हैं और चुनाव लड़ते हैं, तो कुछ भूमिगत रूप से संघर्ष में विश्वास करते हैं। कुछ भूमिगत नक्सलवादी, माओवादी संगठनों को सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा है। लेकिन यहीं यह ध्यान रखने योग्य बात है कि इन संगठनों की विचारधारा को मानने पर कोई मनाही नहीं है। इसीलिए पुलिस किसी को नक्सलवादी, माओवादी विचारधारा का समर्थक बताकर गिरफ्तार नहीं कर सकती है, जैसा कि पुलिस अक्सर करती है। हमें विचारधारा व संगठन के अंतर को समझना होगा।

2. इसी प्रकार पुलिस जब यह कहती है कि उसने नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी साहित्य (कई बार धार्मिक साहित्य को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है) पकड़ा है, तो उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि आखिर कौन-कौन सी किताबें इसमें शामिल हैं। मित्रो, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी खास तरह की विचारधारा से प्रेरित होकर लिखी गयी किताबें रखना/पढ़ना कोई अपराध नहीं है। पुलिस द्वारा अक्सर ऐसी बरामदगियों में कार्ल मार्क्स, लेनिन, माओत्से तुंग, स्‍टालिन, भगत सिंह, चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो, चारू मजूमदार, किसी संगठन के राजनीतिक कार्यक्रम या धार्मिक पुस्तकें शामिल होती हैं। ऐसे समय में पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि कालेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ायी जा रहे इन राजनीतिक विचारकों की किताबें भी नक्सली, माओवादी, आतंकी साहित्य हैं? क्या उसको पढ़ाने वाला शिक्षक, प्रोफेसर या पढ़ने वाले बच्चे भी नक्सली, माओवादी, आतंकी हैं? पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रतिबंधित साहित्य का क्राइटेरिया क्या है, या कौन सा वह मीटर/मापक है, जिससे पुलिस यह तय करती है कि यह नक्सली, माओवादी, आतंकी साहित्य है।

3. यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है की अक्सर देखा जाता है की पुलिस जब कोई हथियार, गोला-बारूद बरामद करती है तो मीडिया के सामने खुले रूप में (कई बार बड़े करीने से सजा कर) पेश की जाती है, लेकिन वही पुलिस जब नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी साहित्य बरामद करती है तो उसे सीलबंद लिफाफों में पेश करती है। इन लिफाफों में क्या है, हमें नहीं पता होता है लेकिन हमारे सामने इसके लिए कुछ ‘अपराधी’ हमारे सामने होते हैं। आप पुलिस से यह भी मांग करें कि बरामद नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी साहित्य को खुले रूप में सार्वजनिक किया जाए।

4. मित्रो, नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तारियों के पीछे किसी खास क्षेत्र में चल रहे राजनीतिक-सामाजिक व लोकतांत्रिक आंदोलनों को तोड़ने, दबाने या किसी खास समुदाय को आतंकित करने जैसे राजनीतिक लोभ छिपे होते हैं। ऐसे समय में यह हमें तय करना होता है कि हम किसके साथ खड़े होंगे। सत्ता की क्रूर राजनीति का सहभागी बनेंगे या न्यूनतम जरूरतों के लिए चल रहे जन आंदोलनों के साथ चलेंगे।

5. हम उन तमाम संपादकों, स्थानीय संपादकों, मुख्य संवाददातों से भी अपील करते हैं कि वह अपने क्षेत्र में नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अपराध संवाददाता (क्राइम रिपोर्टर) को न दें। यहां ऐसा सुझाव देने के पीछे इन संवाददाताओं की भूमिका को कमतर करके आंकना हमारा उद्देश्य कतई नहीं है। हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि यह संवाददाता रोजाना चोर, उचक्‍कों, डकैतों और अपराधों की रिपोर्टिंग करते-करते अपने दिमाग में खबरों को लिखने का एक खांचा तैयार कर लेते हैं और सारी घटनाओं की रिपोर्ट तयशुदा खांचे में रख कर लिखते हैं। नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद की रिपोर्टिंग हम तभी सही कर सकते हैं जब हम इस तयशुदा खांचे से बाहर आएंगे। नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद कोई महज आपराधिक घटनाएं नहीं हैं। यह शुद्ध रूप से राजनीतिक मामला है।

6. हमें पुलिस द्वारा किसी पर भी नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी होने के लगाये जा रहे आरोपों की सत्यता की पुख्ता जांच करनी चाहिए। पुलिस से उन आरोपों के संबंध में ठोस सबूत मांगे जाने चाहिए। पुलिस से ऐसे कथित नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी के पकड़े जाने के आधार की जानकारी जरूर लें।

7. हमें पुलिस के सुबूत के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी सत्यता की जांच करने की कोशिश करनी चाहिए। मसलन अभियुक्त के परिजनों से बातचीत करना चाहिए। परिजनों से बातचीत करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के आरोपों के बाद ही हम उस व्यक्ति को अपराधी मान बैठते हैं और उसके बाद उसके परिजनों से भी ऐसे सवाल पूछते हैं, जो हमारी स्टोरी व पुलिस के दावों को सत्य सिद्ध करने के लिए जरूरी हों। ऐसे समय में हमें अपने पूर्वाग्रह को कुछ समय के लिए किनारे रख कर, परिजनों के दर्द को सुनने, समझने की कोशिश करनी चाहिए। शायद वहां से कोई नयी जानकारी निकल कर आये, जो पुलिस के आरोपों को फर्जी सिद्ध करे।

8. मित्रो, कोई भी अभियुक्त तब तक अपराधी नहीं है, जब तक कि उस पर लगे आरोप किसी सक्षम न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाते या न्यायालय उसे दोषी नहीं करार देती। हमें केवल पुलिस के नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी बताने के आधार पर ही इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द लिखते समय ‘कथित’ या ‘पुलिस के अनुसार’ जरूर लिखना चाहिए। अपनी तरफ से कोई जस्टिफिकेशन नहीं देना चाहिए।

पत्रकार बंधुओ,

यहां इस तरह के सुझाव देने के पीछे हमारा यह उद्देश्य कत्तई नहीं है कि आप किसी नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी का साथ दें। हम यहां कोई ज्ञान भी नहीं देना चाहते। हमारा उद्देश्य केवल इतना सा है कि ऐसे मसलों की रिपोर्टिंग करते समय हम जाने-अनजाने सरकारी प्रवक्ता या उनका हथियार न बन जाएं। ऐसे में जब हम खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा या वाच डाग कहते हैं, तो जिम्मेदारी व सजगता की मांग और ज्यादा बढ़ जाती है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) आपको केवल इसी जिम्मेदारी का एहसास कराना चाहती है।

उम्मीद है कि आपकी लेखनी शोषित/उत्पीड़ित समाज की मुखर अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकेगी!!

निवेदक
आपके साथी,
विजय प्रताप, राजीव यादव, अवनीश राय, ऋषि कुमार सिंह, चंद्रिका, शाहनवाज आलम, अनिल, लक्ष्मण प्रसाद, अरुण उरांव, देवाशीष प्रसून, दिलीप, शालिनी वाजपेयी, पंकज उपाध्याय, विवेक मिश्रा, तारिक शफीक, विनय जायसवाल, सौम्या झा, नवीन कुमार सिंह, प्रबुद्ध गौतम, पूर्णिमा उरांव, राघवेंद्र प्रताप सिंह, अर्चना महतो, राकेश कुमार।

जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) की ओर से जनहित में जारी

Advertisements
 
1 Comment

Posted by on February 16, 2010 in Uncategorized

 

One response to “पत्रकारों से एक अपील : खबरों की समझ के सिलसिले में

  1. சர்வதேசியவாதிகள்

    February 17, 2010 at 7:57 am

     

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s